
चंडीगढ.
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने तमिलनाडु के एक केस में मुफ्त की योजनाओं को लेकर कड़ी टिप्पणी की है। पीठ ने कहा कि अगर लोगों को राज्य मुफ्त में ही सब कुछ देने लगे तो वे काम क्यों करेंगे। पीठ ने यह भी कहा है कि यह हालात केवल किसी एक राज्य के नहीं है, बल्कि सभी राज्यों में इसी तरह हो रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से पंजाब भी अछूता नहीं है। पंजाब में समय-समय की सरकारों की ओर से वोट बैंक को साधने के लिए शुरू की गई सब्सिडी की प्रथा को किसी भी सरकार ने रोकने की हिम्मत नहीं की, बल्कि हर सरकार ने इसमें बढ़ोतरी ही की है। पंजाब में चुनाव से पहले एक बार फिर मतदाताओं को रिझाने के लिए मुफ्त की रेवड़ियां देने की घोषणाएं होने लगी हैं।
शिरोमणि अकाली दल के प्रधान सुखबीर बादल ने दो दिन पहले सत्ता में आने पर बुढ़ापा पेंशन 1,500 से बढ़ाकर 3,100 रुपये करने और शगुन योजना के तहत एक लाख रुपये देने की घोषणा की है। इसी तरह आम आदमी पार्टी ने अपनी सरकार के कार्यकाल के अंतिम साल में महिलाओं को 1000-1000 रुपये देने की तैयारी की हुई है, जिसका मार्च महीने में पेश होने वाले बजट में प्रावधान किया जा सकता है।
कहां-कहां कितनी खर्च हो रही है सब्सिडी
- 22,000 करोड़ रुपये इस समय किसानों, घरेलू और इंडस्ट्री सेक्टर को निशुल्क व सस्ती बिजली देने पर खर्च हो रहे।
- 4,800 करोड़ रुपये बुढ़ापा पेंशन आदि के लिए दी जा रही है।
- 750 करोड़ रुपये महिलाओं को बसों में निशुल्क सफर के तहत दिया जा रहा है।
- इसी तरह जो लोग मुफ्ट राशन जिसके तहत गेहूं और चावल दिए जा रहे हैं में नहीं आते उन्हें सरकार अपनी ओर से राशन मुहैया करवा रही है। इस पर सब्सिडी दी जा रही है।
पंजाब में 1997 से शुरू हुआ सब्सिडी कल्चर
पंजाब में 1997 में शुरू हुआ सब्सिडी कल्चर आज तक चलता जा रहा है। हर साल इसमें कोई कमी होने के बजाय बढ़ोतरी ही हो रही है और आज हालात यह है कि पंजाब की आमदनी के प्रमुख स्रोत जीएसटी से सरकार को केवल 24 से 25 हजार करोड़ ही मिल पा रहे हैं, जबकि सब्सिडी पर खर्च की बात करें तो यह लगभग 28 हजार करोड़ रुपये है। यह भी उस समय है जब मौजूदा सरकार ने अभी महिलाओं को एक-एक हजार रुपये देना शुरू नहीं किया है। अगर यह योजना शुरू होती है तो राज्य के खजाने पर 12 हजार करोड़ रुपये का और बोझ पड़ेगा। (राज्य में एक करोड़ वोटर महिलाएं हैं)। सब्सिडी के इस बोझ के कारण जहां पंजाब में कैपिटल एक्सपेंडिचर नहीं हो रहा है, वहीं विभागों में कर्मचारियों को भर्ती करने में दिक्कत आ रही है, क्योंकि उन पर खर्च होने वाले वेतन का बोझ पहले से ही काफी ज्यादा है।