
जयपुर.
राजस्थान हाई कोर्ट ने एक बेहद पेचीदा और भावनात्मक मामले में कानून की नई लकीर खींची है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि एक 93 वर्षीय महिला को यह साबित करने के लिए DNA टेस्ट से गुजरना होगा कि याचिकाकर्ता महिला उसकी सगी बेटी है या नहीं। जस्टिस बिपिन गुप्ता की बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि भारतीय कानून में 'पित्रत्व' (Paternity) को लेकर तो धारणाएं मौजूद हैं, लेकिन 'मातृत्व' (Maternity) को नकारने का यह मामला अनूठा है।
क्या है पूरा विवाद?
इस कानूनी लड़ाई की शुरुआत एक पुश्तैनी कृषि भूमि को लेकर हुई। याचिकाकर्ता महिला के पिता ने साल 2014 में अपनी पैतृक संपत्ति को लेकर एक वसीयत रजिस्टर्ड करवाई थी। जब बेटी को इस वसीयत का पता चला, तो उसने इसे अदालत में चुनौती दी। उसका तर्क था कि पैतृक संपत्ति की वसीयत नहीं की जा सकती। उसने संपत्ति में अपनी मां के साथ आधे हिस्से की मांग की। यहीं से कहानी में ट्विस्ट आया। मां और दो अन्य लोगों ने कोर्ट में लिखित जवाब दिया कि याचिकाकर्ता महिला उनकी बेटी ही नहीं है।
'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' मामला !
हाई कोर्ट ने इस स्थिति पर गहरी हैरानी जताई। जस्टिस गुप्ता ने टिप्पणी की कि समाज में अक्सर पुरुष (पिता) बच्चे के पितृत्व को नकारते हैं (अक्सर बेवफाई के आरोपों के आधार पर), लेकिन यह बहुत ही दुर्लभ मामला है जहाँ एक महिला यह कह रही है कि बच्चा उसका नहीं है। कोर्ट ने 'भारतीय साक्ष्य अधिनियम' और नए 'भारतीय साक्ष्य संहिता (BSA) 2023' का हवाला देते हुए कहा कि कानून में शादी के दौरान पैदा हुए बच्चे के पिता के बारे में तो स्पष्ट प्रावधान हैं, लेकिन विधायिका ने कभी ऐसी स्थिति की कल्पना ही नहीं की थी जहाँ एक मां ही बच्चे को अपना मानने से मना कर दे।
राइट टू प्राइवेसी बनाम सच का अधिकार
निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने पहले बेटी की डीएनए टेस्ट की मांग को खारिज कर दिया था। निचली अदालत का तर्क था कि टेस्ट के लिए मजबूर करना बुजुर्ग महिला की निजता (Privacy) का उल्लंघन होगा। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए कहा,"आज की भौतिकवादी दुनिया में माता-पिता होने को स्वीकार करना या नकारना आसान हो गया है, लेकिन एक बच्चे के लिए यह साबित करना बहुत कठिन है कि वह किसका है। जब कानून में मातृत्व को लेकर कोई पूर्व धारणा नहीं है, तो विज्ञान (DNA) ही एकमात्र रास्ता है।"
अगर मां ने टेस्ट से किया मना, तो…?
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच भी रखा है। कोर्ट ने कहा कि किसी को भी डीएनए टेस्ट के लिए जबरन मजबूर नहीं किया जा सकता। लेकिन, अगर 93 वर्षीय मां टेस्ट कराने से इनकार करती है या उपस्थित नहीं होती है, तो कोर्ट भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 के तहत याचिकाकर्ता (बेटी) के पक्ष में 'धारणा' (Presumption) बना सकता है। यानी, इनकार को बेटी के दावे की पुष्टि मान लिया जाएगा।
क्यों खास है यह फैसला?
यह फैसला आधुनिक युग में बदलती पारिवारिक संवेदनाओं और कानूनी शून्यता (Legal Vacuum) को भरता है। कोर्ट ने माना कि जब विज्ञान के पास किसी सच्चाई को साबित करने के पुख्ता साधन मौजूद हैं, तो तकनीकी कारणों से किसी बच्चे को उसके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।



