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गंगा से ब्रह्मपुत्र-गोदावरी तक खतरे में इलाके, 23 करोड़ लोग डूबने के जोखिम में

  नई दिल्ली
एक नई वैश्विक स्टडी के अनुसार भारत के कई बड़े नदी डेल्टा क्षेत्र तेजी से डूब रहे हैं. यह डूबना समुद्र के बढ़ते जल स्तर से भी तेज है. गंगा-ब्रह्मपुत्र, महानदी, ब्राह्मणी और गोदावरी जैसे डेल्टा सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. शोधकर्ताओं का कहना है कि अत्यधिक भूजल निकासी इस समस्या का मुख्य कारण है, जिससे लाखों लोगों को बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है.

डेल्टा क्षेत्र क्या हैं और क्यों महत्वपूर्ण?

नदी डेल्टा वो जगहें हैं जहां नदियां समुद्र में मिलती हैं. ये क्षेत्र सिर्फ 1 प्रतिशत भूमि पर फैले हैं, लेकिन दुनिया की लगभग 6 प्रतिशत आबादी (35 से 50 करोड़ लोग) यहां रहती है. भारत में गंगा-ब्रह्मपुत्र, महानदी, ब्राह्मणी, गोदावरी, कावेरी और कबनी जैसे डेल्टा लाखों लोगों का घर हैं.

ये डेल्टा कृषि, मछली पालन, बंदरगाहों और व्यापार के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं. वे आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक रूप से जरूरी हैं. लेकिन ये बहुत नाजुक हैं क्योंकि ज्यादातर हिस्से समुद्र तल से सिर्फ 2 मीटर ऊपर हैं. जलवायु परिवर्तन से बढ़ते समुद्र स्तर, तूफान, बाढ़ और मौसम में बदलाव इन क्षेत्रों को खतरे में डाल रहे हैं.

समस्या क्या है: भूमि का डूबना (सब्सिडेंस)

स्टडी 'नेचर' जर्नल में प्रकाशित हुई है. इसमें 29 देशों के 40 बड़े डेल्टाओं का विश्लेषण किया. इनमें से आधे से ज्यादा डेल्टा सालाना 3 मिलीमीटर से ज्यादा डूब रहे हैं. 13 डेल्टाओं में डूबने की गति समुद्र स्तर के बढ़ने (लगभग 4 मिलीमीटर प्रति वर्ष) से भी तेज है.

    ब्राह्मणी और महानदी डेल्टा: सबसे तेज डूब रहे हैं. ब्राह्मणी के 77 प्रतिशत और महानदी के 69 प्रतिशत क्षेत्र डूब रहे हैं. कई हिस्सों में गति 5 मिलीमीटर प्रति वर्ष से ज्यादा है. 

    गंगा-ब्रह्मपुत्र, गोदावरी, कावेरी और कबनी: इनमें भी बड़े पैमाने पर डूबना हो रहा है. 90 प्रतिशत से ज्यादा क्षेत्र प्रभावित है.

दुनिया भर में लगभग 4.6 लाख वर्ग किलोमीटर डेल्टा भूमि डूब रही है, जो कुल डेल्टा क्षेत्र का 54-65% है. बड़े डेल्टा जैसे गंगा-ब्रह्मपुत्र, नील, मेकॉन्ग आदि कुल डूबते क्षेत्र का 57 प्रतिशत हिस्सा हैं.

मुख्य कारण: भूजल की अत्यधिक निकासी

मानवीय गतिविधियां डूबने का मुख्य कारण हैं. भारत में गंगा-ब्रह्मपुत्र और कावेरी डेल्टा में भूजल निकासी सबसे बड़ा दोषी है. कृषि, उद्योग और घरेलू उपयोग के लिए पानी निकाला जा रहा है, जो रिचार्ज होने से तेज है. इससे जमीन के नीचे की मिट्टी सिकुड़ जाती है. सतह नीचे चली जाती है.

अन्य कारण…

    बांध और बैराज: महानदी और कबनी जैसे डेल्टाओं में ऊपरी इलाकों के बांध नदियों की गाद (सिल्ट) को रोक देते हैं. पहले ये गाद डेल्टा को ऊंचा रखती थीं, लेकिन अब कमी से डूबना बढ़ रहा है.

    जनसंख्या और भूमि उपयोग: ज्यादा लोग रहने से भूमि पर दबाव बढ़ता है.
    समुद्र स्तर बढ़ना: जलवायु परिवर्तन से समुद्र ऊंचा हो रहा है, जो डूबने के साथ मिलकर खतरा दोगुना कर देता है.

18 डेल्टाओं में जैसे भारत के ब्राह्मणी, महानदी, गंगा-ब्रह्मपुत्र और गोदावरी, डूबना समुद्र स्तर बढ़ने से तेज है. इससे बाढ़ का खतरा बढ़ता है, भले समुद्र में बड़ा बदलाव न हो.

लाखों लोगों का खतरा

इन डेल्टाओं में रहने वाले 23 करोड़ से ज्यादा लोग बाढ़ के खतरे में हैं. शहर जैसे कोलकाता (गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा में) तेजी से डूब रहे हैं, जिससे बाढ़, खेती की हानि, नमक का पानी घुसना और बुनियादी ढांचे को नुकसान हो रहा है.

    कृषि और जल संसाधन: खेत बर्बाद हो रहे हैं. मीठा पानी कम हो रहा है.
    पर्यावरण: वेटलैंड्स (गीली भूमि) नष्ट हो रहे हैं, जो बाढ़ से बचाव करती हैं.
    समाज: गरीब और ग्रामीण समुदाय सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. वे निचले इलाकों में रहते हैं. पलायन मुश्किल है. इससे सामाजिक तनाव बढ़ सकता है.

स्टडी कहती है कि ये समस्याएं एक-दूसरे को मजबूत करती हैं, जिससे डेल्टा पृथ्वी के सबसे नाजुक परिदृश्य बन गए हैं.

दुनिया का परिदृश्य

यह समस्या सिर्फ भारत की नहीं है. नील (मिस्र), चाओ फ्राया (थाईलैंड), मेकॉन्ग (वियतनाम) जैसे डेल्टा भी प्रभावित हैं. शहर जैसे ढाका, शंघाई, बैंकॉक डूब रहे हैं. लेकिन भारत के कई डेल्टा अनप्रिपेयर्ड हैं – मतलब खतरा ज्यादा है लेकिन तैयारी कम, क्योंकि संस्थागत और आर्थिक संसाधन कम हैं.

क्या किया जा सकता है?

शोधकर्ता चेतावनी देते हैं कि अगर भूजल निकासी को नियंत्रित नहीं किया, गाद प्रवाह को बहाल नहीं किया और अनुकूलन योजनाएं नहीं बनाईं, तो आने वाले दशकों में बाढ़, भूमि हानि और विस्थापन बढ़ेगा.

    भूजल प्रबंधन: निकासी पर रोक, रिचार्ज को बढ़ावा.
    बांधों का प्रबंधन:
गाद को डेल्टा तक पहुंचने दें.
    अनुकूलन: बाढ़ रोधी दीवारें, मैनग्रूव लगाना.
    नीतियां: स्थानीय समुदायों को शामिल करें, विशेषकर आदिवासी और ग्रामीणों को.

यह अध्ययन हमें याद दिलाता है कि डेल्टा क्षेत्रों की रक्षा जरूरी है, वरना लाखों जीवन खतरे में पड़ जाएंगे. वैश्विक स्तर पर सहयोग और तत्काल कदम उठाने की जरूरत है.

 

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